दृढ़ संकल्प
दूर बहुत दूर सितारों की बस्ती,
आकांक्षा यही है कि आँचल में भर लू।
उपवन भरा है ,गुलाब के फूलों से
चाहता है मन यही तितली बन मकरंद ले लू।
गहरा अति गहरा रत्नाकर डूबू और रत्न समेटू मैं।
घने अति घने बीहड़ वन ,
वनराज को जंजीर में लपेटू मैं।
जल दूर तक पसरा जल,
द्वीप बन कर उभरु मैं।
बादलों से भरा गगन ,
बिजली बन कर कौधू मैं।
संकल्प हो ऐसा ,निराशा कहाँ है?
प्रयास हो भरपूर, हताशा कहाँ है?
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