मातृत्व
मातृत्व का पहला अनुभव
शब्दों के मोती बिखरे पड़े हैं साथ ही संवेदनाओं के रत्न भी, पर इन्हें कैसे समेटू और एक माला में पिरो दु, कुछ समझ नहीं आ रहा।खैर..शादी के 6 माह बाद मेरा अपने पति के साथ मायके जाना हुआ तो एक दिन बहनों के साथ पिक्चर देखने का भी प्रोग्राम बना। हम लोग वहां कुछ समय से कुछ पहले ही पहुंच गए। बहनों ने कहा" चलो दीदी,कुछ खाते हैं"।खाने के दौरान,मुझे चक्कर आने लगे और मैं गिरने ही वाली थी, पर गिरी नहीं, एक मजबूत हाथों ने मुझे थाम लिया और गुड्डी ,गुड्डी पुकारने लगे।वो थे मेरे पतिदेव। सच उस चक्कर में भी मुझे मजा आ गया, बता दूं कि मेरा निकनेम गुड्डी है जिसे सिर्फ मेरे मायके तरफ के लोग बुलाते हैं। उसके बाद तो हम सिनेमा हॉल के बजाय डॉक्टर के यहां पहुंच गए और मुझे वही खुशखबरी मिली कि मैं मां बनने वाली हूं ।इसके बाद तो घरवालों का लाड दुलार बढ़ गया और सभी लोग मेरा खूब ख्याल रखने लगे। इस तरह 9 माह कैसे बीत गए, पता ही नहीं चला। बच्चे की आने की संभावित तिथि 14 जून, 1995थी। 13जून को मुझे कुछ बेचैनी सी महसूस होने लगी।मेरी डिलेवरी को ध्यान में रख कर मुझे हॉस्पिटल ले जाया गया।मेरे पति के साथ साथ मेरी मां भी मेरे साथ रही, दिलासा देती, हनुमान चालीसा पढ़ती, कुछ मनौती मनाती, मेरा हाथ पकड़ कर कहती "देखना, सब कुछ अच्छे से हो जाएगा।"माथा सहलाती। जब लेबर पेन बहुत बढ़ गया,असहनीय दर्द में मैं सोचती"क्या ऐसी ही होती है प्रसव पीड़ा! मैं जानती हूं कि सभी माओं को दर्द होता होगा,पर सभी अपने दर्द की ही हिस्सेदार होती है। अतः मैं भी बहुत बेचैन हो गई थी।मैं जब लेबर रूम में पहुंची और कुछ देर में ही एक सुंदर,गुलाबी होठों वाली, घुंघराले बालों वाली ,गोरी चिट्टी डॉल सी मेरी बिटिया ने मां शब्द को जन्म दिया।डॉक्टर ने कहा तुम्हारी बेटी तुमसे ज्यादा सुंदर है। पर मां बनते ही मेरी दोनों आंखों से झर झर आंसू बह निकले और पहला वाक्य जो मेरे मुंह से निकला वह था *"लव यू मां "*।मेरे मस्तिष्क पटल पर वे सारी तकलीफे एक बार फिर तैर गई। हाँ,"मेरी मां भी इतने कष्ट सहकर मुझे इस दुनिया में लाई होगी।" उस अनुभूति के साथ ही मां के प्रति हृदय कृतज्ञ हो गया,इज्जत शतगु णित हो गई और इस गुड़िया को उस मां को दिखाने के लिए दिल बेचैन सा हो गया कि शायद मैं नातिन को दिखाकर नानी के ऋण से किंचित उऋण सकूं।
ममता कुमारी द्विजा
Date 27 Feb 2023
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